Patna News: बिहार के सहरसा जिले का सहसौल गांव आज पूरे राज्य के लिए मिसाल बन गया है। जिस जमीन पर सालों से पानी भरा रहता था और जो किसानों के लिए मुसीबत का सबब थी, आज वही जमीन ‘सफेद सोना’ यानी मखाना उगल रही है। जल-जीवन-हरियाली अभियान के जरिए यहाँ के किसानों ने न सिर्फ अपनी किस्मत बदली है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक नया अध्याय भी लिख दिया है।
पलायन की मजबूरी से लखपति बनने तक का सफर
सहसौल गांव के किसान गणेश कुमार महतो बताते हैं कि गांव की कई एकड़ जमीन वर्षों से जलमग्न रहती थी। किसान चाहकर भी धान या गेहूं की पारंपरिक खेती नहीं कर पाते थे। इस मजबूरी के कारण लोग या तो गांव से पलायन कर रहे थे या दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर थे। लेकिन ग्रामीण विकास विभाग की योजनाओं और जल-जीवन-हरियाली अभियान ने उनकी सोच बदल दी। मनरेगा के सहयोग से खराब पड़ी जमीन को पोखरों में तब्दील किया गया और मखाने की खेती शुरू की गई।
कम लागत में तीन गुना मुनाफा
मखाने की खेती इन किसानों के लिए घाटे का सौदा नहीं, बल्कि जैकपॉट साबित हो रही है। गणेश महतो के अनुसार, एक एकड़ में मखाने की खेती पर अधिकतम 15 हजार रुपये का खर्च आता है, जबकि इससे होने वाली आमदनी 50 हजार रुपये से भी अधिक है। बाजार में मखाने की कीमत 600 से 1200 रुपये प्रति किलो तक आसानी से मिल जाती है। आज गांव के 19 किसान इस मॉडल को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर चुके हैं।
पर्यावरण संतुलन और स्वरोजगार की नई राह
इस पहल से न केवल किसानों की जेब भरी है, बल्कि गांव में नए तालाबों और पोखरों का सृजन हुआ है। यह जल संचयन और पर्यावरण संतुलन के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। पलायन कर चुके युवा अब वापस लौटकर अपने ही गांव में मखाना उद्योग से जुड़ रहे हैं। सरकार भी मखाना विकास योजना के तहत उन्नत बीजों और टूल किट पर भारी अनुदान दे रही है, जिससे इस क्षेत्र में क्रांति आ गई है।
मंत्री का बयान: वैश्विक पहचान बना रहा बिहार का मखाना
ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि मखाना की खेती ग्रामीण आत्मनिर्भरता का प्रमुख जरिया बन गई है। सरकार के सहयोग से बिहार का मखाना अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। उन्नत तकनीक और अनुदान के जरिए किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य तेजी से पूरा हो रहा है।


