Bhagalpur News: बिहार में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की मनमानी का काला खेल एक बार फिर शुरू हो गया है। राज्य के हर जिले से अभिभावकों की चीख-पुकार सुनाई दे रही है, लेकिन स्कूल प्रबंधन ‘शिक्षा’ को व्यापार बनाकर मोटी कमाई करने में जुटे हैं। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार इस ‘एजुकेशन सिंडिकेट’ के तले दबते जा रहे हैं।
री-एडमिशन के नाम पर ‘अवैध’ वसूली
नियमों को ताक पर रखकर, बिहार के अधिकांश निजी स्कूल हर साल बच्चों के अगली कक्षा में जाने पर ‘री-एडमिशन फीस’ के नाम पर हजारों रुपये वसूल रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि एक बार स्कूल में नामांकन होने के बाद हर साल यह चार्ज लेना पूरी तरह गलत है, लेकिन बच्चों का भविष्य दांव पर होने के कारण वे चुप्पी साधने को मजबूर हैं।
किताबों और ड्रेस में 500% तक का कमीशन!
निजी स्कूलों की लूट का सबसे बड़ा जरिया अब किताबें और ड्रेस बन गई हैं:
- किताबों का खेल: जो किताब बाजार में 100 रुपये की मिलनी चाहिए, स्कूल उसे विशेष पब्लिशर के नाम पर 500 रुपये में बेच रहे हैं। कई स्कूलों ने तो स्कूल परिसर के अंदर ही दुकानें खोल रखी हैं या किसी खास दुकान से ही सामान लेने का दबाव बनाया जाता है।
- हर साल बदली जाती है ड्रेस: ताज्जुब की बात यह है कि स्कूल प्रबंधन हर साल या दो साल में ड्रेस का डिजाइन या रंग बदल देते हैं ताकि पुराना ड्रेस काम न आ सके और अभिभावकों को नई ड्रेस खरीदने पर मजबूर किया जा सके।
शिक्षा माफिया का बढ़ता मनोबल, UP की तर्ज पर कार्रवाई की मांग
अभिभावकों का आरोप है कि बिहार में शिक्षा विभाग की सुस्ती के कारण इन माफियाओं का मनोबल बढ़ा हुआ है।
“उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने प्राइवेट स्कूलों की फीस और किताबों की कीमतों पर नकेल कसनी शुरू कर दी है। बिहार सरकार को भी ऐसी ही सख्त कार्रवाई करनी चाहिए ताकि आम आदमी की कमर न टूटे।” — एक पीड़ित अभिभावक
प्रमुख मुद्दे जिन पर जनता मांग रही है जवाब:
- री-एडमिशन फीस: क्या हर साल एडमिशन के नाम पर पैसे लेना कानूनी है?
- किताबों की मोनोपॉली: NCERT की जगह महंगे प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें क्यों थोपी जा रही हैं?
- कोचिंग की मनमानी: स्कूल के बाद भारी-भरकम फीस वाली कोचिंग का बोझ बच्चों पर क्यों?


