Home बिहार स्वाधीनता के दीवाने अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न थे: डॉ. दवे

स्वाधीनता के दीवाने अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न थे: डॉ. दवे

रिपोर्ट – सैयद ईनाम उद्दीन

सिल्क टीवी/भागलपुर (बिहार) : 1857 का स्वतंत्रता संग्राम भारत की आजादी का प्रथम संग्राम माना जाता रहा है, स्वाधीनता के बाद अंग्रेजों और उनके द्वारा जो लोग सत्ता में काबिज किए गए उन्होंने इस प्रकार से पूरे भारतीय समाज में यह बताया कि भारत कई वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा। किंतु ऐसा नहीं है, भारत कभी भी पूर्ण रूप से गुलाम नहीं रहा है। मुगलों, पुर्तगालियों, डच, अंग्रेजों का अतिक्रमण अखंड भारत के विभिन्न हिस्सों में रहा, किंतु भारत कभी भी अखंड रूप से गुलाम नहीं रहा। भारत में कई हिस्सों में निरंतर स्वाधीनता संग्राम और ऐसी गतिविधियां चलती रही हैं। अखंड भारत के अंतर्गत नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार, बर्मा इत्यादि कई हिस्से थे। यहां पर कुछ ना कुछ स्वाधीनता संग्राम के गतिविधियाँ चलती रही हैं। उक्त बातें डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश द्वारा वेबिनार में बतौर मुख्य वक्ता बताया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही प्रो. आशा शुक्ला ने स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय एवं हेरीटेज सोसाईटी की विभिन्न गतिविधियो का उल्लेख किया। राष्ट्रभक्ति के उन दीवानों को याद करने और समाज के साथ ऐसे अचिन्हित संस्करणों तथा वीर सेनानियों को याद कर इन कार्यक्रमों का अभिलेखीकरण कर प्रकाशित कर समाज को एक धरोहर के रूप में प्रदान किया जायेगा। डॉ. 23 नवंबर से 7 दिसंबर तक बी. आर. अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस को मनाया जा रहा है , यह कार्यक्रम डा. अम्बेडकर वैचारिक स्मरण पखवाड़े के अंतर्गत संचालित किए जा रहे हैं।

समाज भारतीय स्वाधीनता संग्राम को विद्रोह कहता है क्योंकि उनको ऐसे ही बताया गया। 1857 से ठीक 100 वर्ष पूर्व 1757 से भारत में स्वाधीनता संग्राम आंदोलन प्रारंभ हो चुके थे, जिसे हमें विशुद्ध स्वतंत्रता संग्राम के नाम चाहिए ,जबकि लोग इसे विद्रोह कहते हैं। 1857 की घटना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उस समय किसी धार्मिक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण सेनानी मंगल पांडे ने कारतूस मुंह से खोलने से मना कर दिया था। उस समय उनकी धार्मिक आध्यात्मिक आस्था को ठेस पहुंची थी और वह आंदोलन काफी प्रचलित हुआ , जिस कारण से कर्नल विलर भी मैदान छोड़कर भाग गए थे। स्वाधीनता का यह राष्ट्रीय आंदोलन विशेष रुप से सांस्कृतिक संघर्ष था। यह कर्नल विलर वही है जिसके नाम पर भारत के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर बुक स्टाल की स्थापना की गई। स्वाधीनता की 75वी वर्षगांठ के अवसर पर हमें यह प्रयास करना चाहिए कि रेलवे स्टेशन पर साहित्य विक्रय केंद्र अंग्रेजो के नाम पर ना होकर भारतीय सेनानियों के नाम पर होना चाहिए। महापरिनिर्वाण दिवस का उल्लेख करते हुए, डॉ. दवे ने विद्यार्थियों, शोधार्थियो और युवा पीढ़ी के हृदय तक इन सब आंदोलनों की समुचित जानकारी उपलब्ध की जा सके और जो राष्ट्रभक्ति का जुनून हमारे उन वीर सेनानियों के हृदय में था, उनके जोश में था उनके संकल्प में था, वह भावना हमारे युवाओ के हृदय में भी बन सके, ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाकर हमें समाज के सभी वर्गों तक ले जाने चाहिए। जिससे हम अपने स्वाधीनता सेनानियों को उनके राष्ट्रभक्ति प्रेम तथा उनके द्वारा दी गई बलिदान को चिरकाल तक स्मरण कर सकते हैं। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह, विवेकानंद कई महान आत्माओं का उल्लेख किया। इनके बलिदान के संदर्भ में बहुत कुछ जानकारी नहीं मिलती है। जब वीर सेनानियों की बात की जाती है तब कुछ चित्र ही हमारे समक्ष आते हैं और उनको हम पहचान लेते हैं और असंख्य ऐसे वीर सेनानी भी हैं जो 8 वर्ष की उम्र से लेकर वृद्धावस्था तक क्रांतिकारी आंदोलनो में शामिल हुए हैं। जिन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ कर किताबों में बंदूक और बम रखकर अंग्रेजों का विरोध किया है और स्वाधीनता संग्राम को गति प्रदान की। ऐसे वीर सेनानियों ने अपनी युवावस्था में अपने माता-पिता से यह कहते हुए घर छोड़ दिया कि उनका विवाह स्वतंत्रता से हुआ है उसी से हम विवाह करेंगे और दुल्हन के रूप में और कोई आएगा तो मौत आएगी जब तक भारत माता की बेड़ियों को हम काट नहीं देते तब तक घर नहीं लौटेंगे। इस प्रकार से ऐसे कई सारे आंदोलनों का उल्लेख जो इतिहास में दर्ज नहीं है। आंदोलन में गरीब तबके से लेकर जनजातीय समुदाय, व्यापारी, इतिहासकार, वैज्ञानिक, समाजसेवी, शिक्षक, वकील, समाज के प्रत्येक वर्ग से लोग सहयोग कर रहे थे। लेकिन इतिहास में वही पढ़ाया जाता है, जो अंग्रेजों ने लिखा। अंग्रेजों की नीति का उल्लेख करते हुए बताया कि राजाओं को पुत्र गोद लेने का अधिकार नहीं था। निसंतान राजा दत्तक पुत्र नहीं बना सकते थे। ऐसे समय में राजाओं की संपत्ति और राज्य को सब अंग्रेज लोग हड़प लेते थे। उस समय अंग्रेजों से लोहा लेने वाले रंगो बापू गुप्ते का आपने उल्लेख किया, जिन्होने भारतीय सेनानियों को एक सूत्र में बांधा हैं जिन्होंने शेर की मांद में घुसकर लंदन जाकर भारतीय सेनानियों को एकत्र कर और वहां पर अंग्रेजी सत्ता का विरोध किया है।

ऐसे बहुत सारे वीर सेनानी सावरकर, रामचंद्र भट्ट, बाजीराव, तात्या टोपे, नारायण राव, भागवत रामचंद्र राव, स्वामी हरिदास, का उल्लेख किया। रंगो बापू गुप्ते के बेटे को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया किंतु रंगो बापू गुप्ते अंग्रेजों के हाथ नहीं आए और पूरे देश में प्रवास करते रहे और अंत में उनके मृत्यु का भी किसी को कोई संज्ञान नहीं रहा। श्यामजी कृष्ण का उल्लेख होता है जिन्होंने इंडिया हाउस की स्थापना की। रामचंद्र भट्ट जो वीर गंगाधर राव के बड़े भाई थे, जिन्हें महाराष्ट्र में बड़े भाई तात्या कहा जाता है। बाजीराव जी ने तात्या को टोप भेंट किया था , इसलिए रामचंद्र भट्ट का नाम तात्या टोपे के नाम से जाना जाता है। तात्या टोपे का संघर्ष अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम संघर्ष था। वर्तमान पीढ़ी तथ्यात्मक ज्ञान को पढ़ने के बजाय फिल्मों द्वारा जो सूचनाएं परोसी जाती हैं, उसी को आधार मानते हैं क्योंकि हमारा अभ्यास तथ्यात्मक सामग्री को पढ़ने का नहीं रहा। अपेक्षा यह होनी चाहिए कि हम किसी न किसी प्रकार से अपने इतिहास को जाने। रानी लक्ष्मी बाई की वीरगाथा जगजाहिर है जिन्होने अपने छोटे से बच्चे को पीठ पर बाँधकर स्वाधीनता संग्राम में अपना बलिदान दिया है। लाला हरदयाल के संदर्भ में भी बहुत सारी रोचक तथ्यों को रखा। लाला हरदयाल जी का दिमाग कंप्यूटर से भी अधिक तेज था। बौद्धिक कौशल से संपन्न अप्रतिम अद्वितीय प्रतिभा से संपन्न लाला हरदयाल उस समय सभी के आकर्षण का केंद्र रहते थे। बाल जिज्ञासा से कई बार उनका परीक्षण किया गया। चाहे वह भाषा विज्ञान के हो अंग्रेजी, गणित, कंप्यूटर के हो या अन्य किसी विधाओं के हो। लाला हरदयाल जी ने सभी प्रश्नों को न केवल हल किया बल्कि कई सारी अद्वितीय एवं कई सारी रोचक बातों से अवगत कराते हुए लोगों को आश्चर्यचकित भी किया। चाचा चौधरी को तो सभी जानते हैं लेकिन उन से भी तेज लाला हरदयाल जी को कोई नहीं जानता लाला हरदयाल जी ने अपने अद्वितीय स्मृति का परिचय देकर लोगों को हतप्रभ किया है। ग्वालियर के सेट अमरचंद बांठिया को भी हमें याद करना चाहिए। उन्होंने अपना पूरा खजाना आवश्यकता पड़ने पर झांसी की रानी को सौंप दिया था। स्वाधीनता संग्राम में एक व्यापारी ने भी अपना योगदान दिया है। हमें ऐसे ही वीर सेनानियों को याद करना चाहिए। 80 वर्ष की उम्र में बाबू कुंवर सिंह को गोली हाथ में लगी थी, उन्होंने तलवार से अपना हाथ काट कर एक हाथ से अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए हैं और अंग्रेजों को हताहत किया है। हमारे वीर सेनानी काव्य और कविता में भी अद्वितीय प्रतिभाओं के धनी थे। उन्होंने भारतीय समाज को अपनी कविताओं के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा किया है और अपनी कविताओं को राष्ट्र के लिए समर्पित किया है। इसी कारण उन्हें कविता पाठ के संदर्भ में गिरफ्तार कर फांसी की सजा दी गई। इसीलिए आज का विषय किस रज से बनते कर्मवीर बहुत रोचक हो जाता है। राष्ट्रभक्ति की पवित्र मिट्टी से ही बनते होंगे। युवावस्था से हम अपने कैरियर घर गृहस्थी बसाने और धन कमाने की होड़ में रहते हैं किंतु उस काल के वीर सेनानी धन संपन्न होते हुये भी अपना सब छोड़ कर अपनी बलिदानी देश को दी है। हमें ऐसे रणबांकुरे को याद करना चाहिए जिन्होंने अपने पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर स्वाधीनता आंदोलन में बलिदान दिया है। प्रो विकास दवे ने स्वाधीनता संग्राम की ऐसी अनेकों घटनाओं का उल्लेख किया जिसके कारण युवा पीढ़ी को वीर सेनानियों के संदर्भ में जानकारी प्राप्त हुई।

हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डॉ. अनंताशुतोष द्विवेदी ने धन्यवाद ज्ञापन में विद्वान वक्ता के ज्ञानवर्धक व्याख्यान की प्रशंसा करते हुए ऑनलाइन आयोजन में जुड़े दर्शकों से अपने क्षेत्र के भूले -बिसरे स्वतंत्रता सेनानियों को लिपिबद्ध कर आयोजन समिति को अवगत कराने हेतु अनुरोध भी किया। डॉ. द्विवेदी ने दर्शकों को फीडबैक फॉर्म भी भरने हेतु अनुरोध किया ताकि प्रतिभागिता प्रमाण-पत्र दिया जा सके। इस कार्यक्रम की अकादमिक संयोजक प्रो. नीरु मिश्रा एवं प्रो. शैलेंद्र मणि त्रिपाठी तथा कुलसचिव डॉ. अजय वर्मा का योगदान सराहनीय रहा है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अजय दुबे द्वारा किया गया कार्यक्रम में दोनों संस्थाओं के पदाधिकारियों तथा कर्मचारियों का सहयोग रहा। इस अवसर पर देश-विदेश के वरिष्ठ स्वतंत्रता चिन्तक, शिक्षक एवं शोधार्थी आभासी मंच से जुड़े रहे।

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