Home राष्ट्रीय सड़क पर रहने वाले बच्चों के राष्ट्र निर्माता बनने की राह

सड़क पर रहने वाले बच्चों के राष्ट्र निर्माता बनने की राह

अनेकों योजनाओं और कानूनी प्रावधानों के बावजूद स्ट्रीट चिल्ड्रेन की समस्या इसलिए बनी रही क्योंकि अब तक हम इसे सामाजिक समस्या के तौर पर देखते रहे हैं और हमने कानूनी पहलू से स्ट्रीट चिल्ड्रेन की समस्या को देखा ही नहीं । Standard Operating procedure for Children in Street Situations इसी समस्या के समाधान की दिशा में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के द्वारा किया गया एक समग्र प्रयास है।

जिस गति से देश में शहरीकरण हो रहा है उससे निश्चित ही देश की विकास यात्रा स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है किंतु इन्हीं विकसित हो रहे शहरों की सड़कों पर देश के भविष्य की राह को पुष्ट करने वाला बचपन धूमिल होता दिखना भी हमारे समाज की सच्चाई है, जिससे किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे क्या कारण हो सकते हैं जब देश में बच्चों के लिए अनेकों योजनाएं हैं साथ ही संविधान और विभिन्न कानून भी उन्हें विकास के समान अवसर देते हैं, फिर भी वह सड़कों पर जीवन व्यतीत करने को मजबूर है। विकास और सामाजिक पिछड़ेपन का यह एक ऐसा द्वंद है जिसका समाधान खोजे बिना हम देश के विकास को नई दिशा नहीं दे सकते। बच्चों का सड़क पर इस तरह से जीवन व्यतीत करना बड़े स्तर पर उनके संवैधानिक अधिकारों का उलंघन है जिसका समग्र दुष्प्रभाव उनके मानसिक, शारीरिक और शैक्षणिक विकास पर पड़ता है और अंत में उसका भुगतान देश को करना पड़ता है। SOP 2.0: Standard Operating procedure for Children in Street Situations इसी समस्या के समाधान की दिशा में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के द्वारा किया गया एक समग्र प्रयास है।
जब हम अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने वाले बच्चों की बात करते हैं तो हमारे समक्ष प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी एक ऐसा उदाहरण मौजूद हैं जिन्होंने अभावग्रस्त जीवन जिया है और वह उस भाव को समझते हैं कि किस तरह अभावग्रस्त बचपन में संघर्ष कर मुख्यधारा में शामिल होकर देश के विकास में अपना सहयोग दिया जा सकता है। आयोग ने उनके जीवन और शब्दों से प्रेरणा लेकर यह तय किया कि यदि शुद्ध अंतकरण से हम कार्य करेंगे तो केवल असंभव शब्द ही असंभव रह जाता है बाकी सब संभव हो जाता है। कुछ भी असंभव नहीं है और यही वह समय है जब हम यह तय कर सकें कि जो बच्चे सड़क पर हैं उन्हे घर मिलना चाहिए और यह उनका अधिकार है।
इस ओऱ आगे बढ़ने के लिए यह उचित समय था जब हमारे पास 2 लाख से ज्यादा ऐसे बच्चों की जानकारी उपलब्ध थी जो सड़कों पर जीवन व्यतीत करने को बाध्य हैं। इन बच्चों को कैसे समाज की मुख्यधारा से जोड़ सकें इसके लिए 1 वर्ष से हम लोगों ने आयोग के बाहर और अंदर सतत रूप से कार्य किया है। इस दौरान बच्चों से उनकी स्थिति में मिलकर उनसे बात की औऱ उनकी समस्याओं को दर्ज किया जिससे कि उनके समाधान की राह बनाई जा सके। इसके साथ ही इस एसओपी (SOP) को बनाने में राज्य बाल आयोगों ने अपने महत्वपूर्ण विचार दिए हैं। अनेकों योजनाओं और कानूनी प्रावधानों के बावजूद स्ट्रीट चिल्ड्रेन की समस्या इसलिए बनी रही क्योंकि अब तक हम इसे सामाजिक समस्या के तौर पर देखते रहे हैं और हमने कानूनी पहलू से स्ट्रीट चिल्ड्रेन की समस्या को देखा ही नहीं। इससे लगातार इन बच्चों के अधिकार तय करने वाले कानूनों का उलंघन होता रहा और यह विकास की धारा में शामिल नहीं हो सके। जब हम उन बच्चों की बात करते हैं जो अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं, सड़क पर जीवन व्यतीत कर रहे हैं या बाल मजदूरी से पीड़ित हैं तो असल में स्ट्रीट चिल्ड्रेन ऐसी श्रेणी है जिसमें सभी तरह के बाल अधिकारों का हनन होने की प्रबल संभावना बनी रहती है फिर चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक।

इन्हीं सब सवालों और समस्याओं के समाधान का मार्ग तलाशने के लिए जब आयोग ने प्रयास शुरू किए तो कई ऐसे तथ्य सामने आए जिससे हमें यह विश्वास हुआ कि देश में ऐसे बच्चों को भी सही भविष्य देने के लिए तंत्र मौजूद है जो किन्हीं अप्रत्याशित कारणों से सड़क पर जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। उदाहरण के तौर पर वर्तमान सरकार द्वारा किशोर न्याय अधिनियम, 2015, आईसीडीएस-आईसीपीएस योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, माइक्रो फाइनेंस समेत अनेकों ऐसी योजनाएं लागू की गई हैं जिनके भीतर ही इस समस्या का समाधान विद्यमान है।
इन्हीं योजनाओं और मौजूदा तंत्र में समन्वय और उत्तम क्रियान्वयन के लिए आयोग ने यह एसओपी (SOP) तैयार की है जिसके माध्यम से सड़क पर रहने वाले बच्चों को मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें ऐसा भविष्य देने का प्रयास किया जा रहा है जिसके वह हकदार हैं। SOP 2.0: Standard Operating procedure for Children in Street Situations एक ऐसा दस्तावेज है जिसे ऐसा समग्र रूप देने का प्रयास किया गया है जिससे बाल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहे सभी विभागों तथा अधिकारियों तथा वर्तमान सरकार द्वारा लागू की गई सभी संबंधित योजनाओं के बीच समन्वय स्थापित हो सके और इसमें दर्शाए गए तरीकों से आसानी से बच्चों को सड़क से विस्थापित कर उनकों अनुकूल वातारण में पुनःस्थापित किया जा सके। आय़ोग का संकल्प है आखिरी बच्चे को मुख्यपंक्ति में लाना। इस संकल्पशक्ति के साथ आयोग देशभर में लगातार कार्य कर रहा है।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जब हमने ऐसे बच्चों को चिन्हित किया तो यह बात सामने आई कि परिवार किन्हीं अप्रत्याशित कारणों से सड़क को नहीं छोड़ना चाहते। इसके लिए उपाय के तौर पर करीब 34 तरह की योजनाओं को चिन्हित किया गया है जिनसे परिवार को जोड़ा जाए। यह पहली बार कोशिश की गई है कि कैसे बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) यह आदेश कर सकती है कि परिवारों को इन योजनाओं के साथ जोड़ा जाए जिससे कि परिवारों का भरण पोषण स्थानीय स्तर पर हो सके। भारत जैसै देश में हम परिवार से अलग करके बच्चों की कल्पना नहीं कर सकते हैं। इसलिए हमारे संकल्प में परिवार को शामिल करना प्रमुखता होना चाहिए। बच्चों की वेलबीइंग सुनिश्चित करने के लिए केवल सरकार पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसके लिए परिवार की अहमियत को समझना होगा और उन्हें बच्चों के विकास की परिधि के केंद्र में रखना होगा और परिवार को मजबूत करना होगा जिसके बाद ही इस समस्या का समाधान हो सकेगा।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय में स्वतः संज्ञान लेकर राज्यों को निर्देश दिया है कि सभी राज्य आयोग द्वारा जारी SOP के क्रियान्वयन को सुनिश्चित कर न्यायालय को रिपोर्ट सौंपे। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से देश भर के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं की उम्मीद जगी है एवं बाल सुरक्षा तंत्र में लगे कर्माचारियों में भी नई उर्जा का संचार हुआ है। इस दस्तावेज में सुझाए गए तरीके स्ट्रीट चिल्ड्रेन की समस्या के स्थायी समाधान के लिए बाल अधिकार कार्यकर्ताओं तथा कर्मचारियों को सहयोग और दिशा प्रदान करेंगे।
लेखक : प्रियंक कानूनगो, अध्यक्ष, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग

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