बिहार

मुंशी प्रेमचंद्र की मनाई गई 141वीं जयंती, वक्ताओं ने कहा आज भी प्रासंगिक हैं प्रेमचंद की रचनाएं

रिपोर्ट – सैयद ईनाम उद्दीन

सिल्क टीवी/भागलपुर (बिहार) : कहा जाता है कि किसी भी लेखक का लेखन जब समाज की गरीबी, शोषण, अन्याय और उत्पीड़न का लिखित दस्तावेज बन जाए तो वह लेखक अमर हो जाता है। प्रेमचंद ऐसे ही लेखक थे। उन्होंने रहस्य, रोमांच और तिलिस्म को अपने साहित्य में जगह नहीं दी बल्कि धनिया, झुनिया, सूरदास और होरी जैसे पात्रों से साहित्य को एक नई पहचान दी, जो यथार्थ पर आधारित था। प्रेमचंद जैसे लेखक सिर्फ उपन्यास या कहानी की रचना ही नहीं करते बल्कि वो गोदान में होरी की बेबसी दिखाते हैं तो वहीं, कफन में घीसू और माधव की गरीबी और उस गरीबी से जन्मी संवेदनहीनता जैसे विषय को कागज पर उकेर कर समाज को आईना दिखाते हैं। वहीं उपन्यास और कहानियों के सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद्र की 141वीं जयंती समारोह शनिवार को टीएनबी कॉलेज प्रशाल में हिंदी विभाग की ओर मनाई गई। समारोह का उदघाटन प्राचार्य डॉ. संजय कुमार चौधरी, पीजी हिंदी विभाग के हेड प्रो. योगेंद्र महतो, प्रो. आलोक चौबे , डॉ. अंजनी कुमार राय और डॉ. मनोज कुमार ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस दौरान वक्ताओं ने महाकवि के जीवन और रचनाओं पर विस्तार से चर्चा की। पीजी हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. योगेंद्र ने कहा कि प्रेमचंद महान कथाकार, नाटककार होने के साथ पत्रकार भी थे। उन्होंने बताया कि मुंशी प्रेमचंद गोदान, गवन, रंगभूमि, कर्मभूमि, कायाकल्प, निर्मला, सेवासदन आदि उपन्यासों के रचयिता और मानसरोवर के आठ खंडों में तीन सौ कहानियों के लेखक होने के साथ हंस, जागरण, मर्यादा आदि पत्रिकाओं के संपादक भी थे। प्राचार्य डॉ. संजय कुमार चौधरी ने बताया कि प्रेमचंद विश्व के श्रेष्ठतम उपन्यासकारों में एक हैं। उनकी रचनाएँ कालजयी है, जो आज भी प्रासंगिक हैं। कार्यक्रम में हिंदी विभाग के शिक्षक ने कहा कि प्रेमचंद ने अपना पूरा जीवन लेखन में झोंक दिया और जीवन के अंतिम समय में भी लिखना नहीं छोड़ा। वे कहते थे कि वे कलम के मजदूर हैं और बिना काम किए उन्हें भोजन का अधिकार नहीं है।

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