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भगवान बिरसा मुंडा जयंती भारत के जनजाति गौरव दिवस के रूप में अभूतपूर्व पहल- शिवशंकर पारिजात

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय तथा हेरीटेज सोसाईटी आदिवासी जनजातियो के उत्थान के कार्यों, विचारों और लोक परंपराओं को समृद्ध करते हुए निरंतर गतिशील है। इस दिशा में निरंतर वैश्विक फलक पर स्थापित होकर जनजातिय समुदाय के सामाजिक सरोकारो को जनमानस तक पहुँचाने के लिए दृढ़ संकल्पित है। उक्त बातें कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महू तथा हेरीटेज सोसाईटी, पटना के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अमृत महोत्सव कार्यक्रम श्रंखला-23 में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार “भारतीय स्वाधीनता संग्राम पृष्ठभूमि: झारखण्ड के आदिवासी सेनानी ” बतौर अध्यक्ष कही। कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि विश्वविद्यालय में स्थापित जननायक टंट्या भील पीठ के द्वारा आदिवासियो के सामाजिक दर्शन एवं कार्यों पर आधारित व्याख्यान, शोध एवं प्रसार गतिविधियां की जाती हैं ताकि जनमानस उनको आत्मसात कर सके। राष्ट्र कल्याण का समरस भाव लोगों में उद्धृत हो सके। विश्वविद्यालय भगवान बिरसा मुण्डा तथा टंट्या मामा के समरसता, समावेशी और सनातन परंपरा के योगदान को आमजन में पहुँचाने के लिए संकल्पित है। कार्यक्रम के प्रस्तावना एवं परिचय वक्तव्य में ब्राउस कुलपति प्रोफेसर शुक्ला ने विश्वविद्यालय में चल रही अकादमिक और सामाजिक गतिविधियों का परिचय देते हुए बताया कि ब्राउस देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है जो जनजातीय क्षेत्र के उत्थान के लिए विभिन्न पीठों का स्थापना कर अपना सामाजिक समरसता और सद्भाव का परिचय दे रहा है। प्रो. शुक्ला ने बताया कि विश्वविद्यालय में मध्य प्रदेश शासन के द्वारा स्थापित जननायक टंट्या भील पीठ है और यहां पर आदिवासी क्षेत्र के उत्थान के लिए बहुत सारी गतिविधियां प्रारंभ की गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर पर आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में हेरीटेज सोसाईटी तथा विश्वविद्यालय 75 राष्ट्रीय एवंअंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक व्याख्यान आयोजित कर रहा है। इस श्रंखला के 23वे व्याख्यान में झारखंड क्षेत्र के आदिवासी सेनानियों को याद किया जा रहा है। यह एक संयोग का विषय है कि आज इस कार्यक्रम के दौरान आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा की जयंती भी है। सौभाग्य की बात है कि आज से 21 वर्ष पूर्व झारखंड की स्थापना भी आज ही हुई थी।


जनजाति गौरव दिवस के रूप में भी कई आयोजन किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री का दौरा है। इस हेतु भोपाल स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन जो कि अंतरराष्ट्रीय सर्वसुविधा युक्त बनाया गया है और जिसको जनजातीय क्षेत्र की महारानी कमलावती के नाम से किया जा रहा है। शिवशंकर सिंह परिजात, पूर्व उप निदेशक, सूचना एवम जन सम्पर्क विभाग, बिहार सरकार मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने भारतीय स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि में झारखंड क्षेत्र के आदिवासी सेनानियों का योगदान का उल्लेख किया।भगवान बिरसा मुंडा जयंती का उल्लेख करते हुए बताया कि आदिवासी जनजातीय समुदाय में बिरसा मुंडा को भगवान की उपाधि दी जाती रही है। वह न केवल राष्ट्रीय नेता, जननायक बल्कि सामाजिक समरसता, सद्भाव और लोगों के लिए भगवान के समान रहे हैं। स्वाधीनता संग्राम में आदिवासी सरोकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भगवान बिरसा मुंडा आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए ही अवतरित हुए थे। प्रधानमंत्री का उल्लेख करते हुए जनजातीय समुदायों के विकास की योजनाओं का भी जिक्र किया। अपने आजादी के पूर्व के कई आंदोलनों के साथ-साथ 1857 ई. का सिपाही विद्रोह जो आजादी के प्रथम संग्राम के रूप में जाना जाता है, के बारे में भी विस्तार से बताया। विदेशी हुक्मरानों के विरुद्ध जब पूरा देश एकत्रित हो रहा था, उसी कड़ी में झारखंड के वीर सेनानियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आदिवासी भाइयों ने अंग्रजो की दमनकारी नीतियो का जमकर विरोध किया है। 1857 से ठीक 2 वर्ष पहले संथाल विद्रोह, जिसमें चांद और भैरव तथा संथाल बंधुओं का आंदोलन प्रारंभ हुआ, यह आदिवासी द्वारा स्वाधीनता संग्राम का बीजारोपण के रूप में सिद्ध हुआ। 1857 के विद्रोह के 75 वर्ष पूर्व तिलका मांझी ने भी पहली बार अंग्रेजों के विरुद्ध भूमि हड़पने की नीति का जबरदस्त विरोध किया। यह आंदोलन उस समय तात्कालिक आंदोलनों में प्रमुख आंदोलन के रूप में सिद्ध हुआ। तिलकामांझी ने उस समय के ब्रिटिश कलेक्टर लीवलेन की हत्या कर दी, जिससे वह भूमि हड़पने की दमनकारी नीतियों पर विराम लगा। इसी प्रकार से भागलपुर क्षेत्र में तिलकामांझी ने लगातार आंदोलन किए। तिलकामांझी के इन्हीं योगदानो के कारण भागलपुर विश्वविद्यालय का नाम तिलकामांझी के नाम से रखा गया। तिलका मांझी के आंदोलनो को प्रारंभिक आंदोलनों का नाम दिया गया। 1857 के पूर्व कई छुटपुट आंदोलन हुए लेकिन इतिहास की मुख्यधारा से उन्हें नहीं जोड़ा जाता। किंतु आज हमें आजादी की अमृत महोत्सव के अवसर पर इन कार्यक्रमों के माध्यम से अनुसंधान के द्वारा ऐसे सभी अचिन्हित आंदोलनों को भी चिन्हित कर अभिलेखीकरण कर आगामी पीढ़ी के सामने रखना चाहिए। ऐसे बहुत से आंदोलन जिनमें चेरवा आंदोलन 1795-1800, 1819-20 चमाड आंदोलन, 1832-33 कोल विद्रोह, 1834 में भूमि विद्रोह और उसके बाद 1857 की क्रांति, 1885 सरदार विद्रोह, 1895 बिरसा आंदोलन, 1912 ताना भगत आंदोलन तथा उस समय चल रहे कई आंदोलनों जिनमें असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन ऐसे तमाम आंदोलनों में झारखंड के आदिवासी भाइयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आदिवासियों का संघर्ष उस समय बहुत महत्वपूर्ण रहा जिसके अंतर्गत बिरसा मुंडा सिद्दो कानो, फूलों झानो, संथाल क्षेत्र के संघर्ष, छोटा नागपुर क्षेत्र के संघर्ष जैसे तमाम ऐसे आंदोलनों का वर्णन मिलता है, जो तेजी से फैल रहे अंग्रेजी साम्राज्य को खदेड़ने में सफल हुए हैं। उस समय अंग्रेजों की एक ही नीति थी कि किसी प्रकार से व्यापारी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए आदिवासी की जमीनों को हड़पा जाए और उन पर दमनकारी नीतियों को लागू किया जाए उस समय वहां चल रही पारंपरिक खेती पर भी कब्जा कर वहां धनाढ्य वर्ग के लोगों को प्रलोभन देकर किस प्रकार से अंग्रेजी सत्ता को बढ़ाया जा सके। आदिवासियों की जमीन हड़पने के लिए वहां पर कई कानून बना दिए गए। 1793 ई. में करनवालिस ने परमानेंट सेटेलमेंट कानून जो निजी जमीन को सामुदायिक जमीन घोषित करता है ऐसे कानूनों लगान प्रथा, सूत प्रथा, पुलिस की दमनकारी प्रणाली इत्यादि कई सारे कानूनों को लागू किया गया इसके जवाब में आदिवासी सेनानियों ने संघर्ष किया। 30 जून 1885 में साहबगंज में सिद्धो कानो की पहली सभा हुई इसमें 40000 लोग शामिल हुए और इस आंदोलन में हजारों लोगों ने सहादत दी थी। इन आंदोलनों से कुछ कानूनों को अंग्रेजी शासन ने वापस लिया। जमीन, सांस्कृतिक अस्मिता, पूर्ण स्वायत्तता, सामाजिक समरसता सद्भाव और भाईचारा आदि कई मुद्दों पर बिरसा मुंडा का महत्वपूर्ण योगदान है लोग उन्हे भगवान की तरह पूजा करते हैं। अंग्रेजों ने इसे अपने विरोध में जानकर उनके आंदोलनो को अवैध घोषित कर दिया। ऐसे कई नियम लागू करके बिरसा मुंडा को जेल में डाल दिया, लेकिन आंदोलन जारी रहा और बाद में रिहाई के बाद पुनः उन्होंने अपने आंदोलनों को गति दी। 9 जून 1900 को 25 वर्ष की उम्र में उनकी जेल में ही मृत्यु हो गई और उस समय 300 आदिवासी जेल में थे इन खबरों को प्रमुखता से प्रेस में प्रचारित किया। उन्नीस सौ आठ में छोटा नागपुर एक्ट लागू करना पड़ा जिसके अंतर्गत आदिवासी भूमि किसी को हस्तांतरित नहीं की जा सकती है। बिरसा मुंडा के विरोध का ही परिणाम था कि ब्रिटिश शासन को इस प्रकार से महत्वपूर्ण कानून को वापस लेना पड़ा और गैर संथाली को भी जमीन नहीं बेची जा सकती है तथा हस्तांतरित भी नहीं की सकती। उस समय कोल विद्रोह सिंध राय और बीनराय, 1831 छोटा,नागपुर और मुंडा जाति के द्वारा चलाया जा रहा था। वह लगान की बढ़ोतरी पर, बेगारी से पीड़ित होने के कारण, अंग्रेजो की दमनकारी के विरोध में चल रहे थे। संतार जत्रा उराव, ताना भगत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे उनकी मुख्य विशेषता थी कि जमीन जंगल के सरोकार तथा सामाजिक सुधार का आंदोलन प्रमुखता से सामने आ रहा था विष्णु माटी मुंडा विद्रोह,भूमि विद्रोह, समय समय पर पूरे झारखंड में कई तरह के आंदोलन अपना स्वरूप ले रहे थे इस कारण से अंग्रेजों की नेटवर्किंग बाहर के प्रवास पुलिस प्रशासन शोषणकारी दमनकारी नीतियों के विरुद्ध गुरिल्ला विद्रोह जैसे आंदोलन सामने आए जो अंग्रेज ब्रिटिश सरकार अपने कार्यक्रमों को संचालित करने में असमर्थ हो गई पहाड़ियों के सर काटने पर अंग्रेजों ने काफी इनाम रखे जंगली जानवरों की तरह आदिवासियों को मारा जाए इस प्रकार अंग्रेजों ने प्लासी और बक्सर के युद्ध के बाद संतार में अपनी दमनकारी नीतियों को अंजाम दिया यह विद्रोह निश्चित रूप से आदिवासी वीर सेनानियों के संघर्ष का परिचय देते हैं। आदिवासी जननायिकाओं की भी स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका रही है इन नायिकाओं ने 1855 में संथाल विद्रोह में सिदधो कानो के आंदोलन में अपना योगदान दिया है। दोनो बहनें फूलों और झानो ने अपने भाइयों के साथ कदम से कदम मिलाकर शिरकत की है और उन्होंने रात्रि में अंधेरे में जाकर 22 गोरे सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया था आज भी उन दोनों बहनों की प्रतिमाएं झारखंड में स्थापित हैं और उन्हें वीरांगनाओं की उपाधि दी जाती है। झारखंड क्षेत्र की वीरांगना सर्वेश्वरी महारानी थी महारानी ने भी कई सारे आंदोलनों में सहभागिता की है। बाद में ब्रिटिश सरकार ने उनकी महारानी की पदवी छीन कर उन्हें अरेस्ट कर लिया और भागलपुर जेल में रखा, जहां पर वे शहीद हो गई। इस प्रकार से आदिवासी बहुत सहज सरल और संवेदनशील रहे हैं जो अपनी भूमि को अपनी जान से भी अधिक प्यार करते हैं। आजादी के अमृत महोत्सव के कार्यक्रमों के दौरान हम उन आदिवासियों को याद कर रहे हैं जो कि एक अभूतपूर्व कार्य है और काफी गौरव का क्षण है। हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डॉ. अनन्ताशुतोष द्विवेदी ने धन्यवाद ज्ञापन में झारखण्ड की स्थापना दिवस, भगवान बिरसा मुंडा की जयंती तथा जनजातीय गौरव दिवस की बधाई देते हुए मुख्य वक्ता श्री शिव शंकर सिंह पारिजात के प्रति प्रति आभार व्यक्त करते हुए कई आदिवासी शूरवीरों द्वारा गुलामी के खिलाफ आवाज उठाई और जननायक बनकर उभरने की बातों को रेखांकित किये। गढ़ा मंडला के शासकों को कौन नहीं जानता है चाहे संग्राम शाह हो , उनके वंशज शंकर शाह हो या रानी दुर्गावती। सीताराम कंवर ने 1857 की क्रांति के दौरान होलकर और बड़वानी राज्य के नर्मदा पार के क्षेत्र (जिनमें आज का निमाड़ क्षेत्र सम्मिलित है) में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक बड़े विद्रोह का नेतृत्व किया था। कंवर ने सतपुड़ा श्रेणी के भीलों को विदेशी शासन उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया और पेशवा तथा तात्या टोपे के साथ गहन संपर्क स्थापित किया। भीमा नायक जो तत्कालीन बड़वानी के पंचमोहली क्षेत्र में 1857 की क्रांति के दौरान ब्रिटिश शासन को गंभीर चुनौती दी। भीमा नायक का प्रभाव पश्चिम में राजस्थान के क्षेत्रों से लेकर पूर्व में नागपुर तक फैल चुका था।

खाज्या नायक जिन्होंने 1856 में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह छेड़ दिया और एक बड़ी सेना एकत्र की। बड़वानी और उसके आसपास के क्षेत्रों में खाज्या का प्रभाव था। 1857 की क्रांति के समापन के बाद भी खाज्या नायक ने ब्रिटिश शासकों को चैन नहीं लेने दिया। रघुनाथ सिंह मंडलोई, सुरेन्द्र साय, टंट्या भील, मंशु ओझा, टुरिया शहीद मुड्डे बाई आदि ऐसे अनेकों नाम है। हमें उनके बलिदानों को अपने पीढ़ी की विस्तार से बताने की आवश्यकता है। उक्त बातें डॉ. द्विवेदी द्वारा बताया गया। कार्यक्रम में हेरीटेज सोसाईटी के अध्यक्ष, महासचिव, अकादमिक संयोजक प्रो. नीरु मिश्रा एवं प्रो. शैलेंद्र मणि त्रिपाठी तथा कुलसचिव डॉ. अजय वर्मा का योगदान सराहनीय रहा है। तकनीकी सहयोग सानन्त टीम के सदस्यों द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अजय दुबे द्वारा किया गया कार्यक्रम में दोनों संस्थाओं के पदाधिकारियों तथा कर्मचारियों का सहयोग रहा। इस अवसर पर देश-विदेश के वरिष्ठ स्वतंत्रता चिन्तक, शिक्षक एवं शोधार्थी आभासी मंच से जुड़े रहे।

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