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निभाया कर्तव्य: सड़क दुर्घटना में घायल युवकों को पहुचाया अस्पताल, एक की सीपीआर विधि से डॉ. अजय ने बचाई जान….

रिपोर्ट – सैयद ईनाम उद्दीन

सिल्क टीवी/भागलपुर (बिहार) : सड़क दुर्घटना में प्रत्येक साल बड़ी संख्या में लोगों की जान चली जाती है। इसके पीछे बहुत सी वजह हैं। जैसे स्पीड ब्रेकर, खराब सड़क, वाहनों की फिटनेस पर ध्यान न देना, लेकिन सबसे बड़ी वजह है वाहनों की अनियंत्रित गति। हाईवे पर वाहन तीव्र गति से चलते हैं, जिससे बड़े हादसे हो जाते हैं।

इसके अलावा युवा फर्राटे से बाइक भी दौड़ाते हुए नजर आते हैं और इन वाहनों की गति इतनी अधिक होती है कि जरा सी चूक हुई तो उनकी और सामने वाले कि जिन्दगी पर संकट आ सकता है। ऐसा ही एक संकट गुरूवार की सुबह भागलपुर में एनएच 80 पर सेंट्रल जेल के समीप देखने को मिला। घटना को लेकर बताया जा रहा है कि छठ महापर्व पर पीपलीधाम बरारी से दो बाईक सवार युवक अर्घ्य देकर अपने घर की ओर लौट रहा था, तभी तिलकामांझी की ओर से विपरीत दिशा में आ रहे बाइक के बीच सीधी टक्कर हो गई।

जिसमें चार युवक घायल हो गया। वहीं घायल युवकों पर जब भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर लौट रहे जीवन जागृति सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार सिंह की नजर पड़ी तो उन्होंने सबसे पहले अचेत अवस्था में पड़े युवक की सीपीआर देकर जान बचाई। इसके बाद चारों युवक को मायागंज अस्पताल में भर्ती करवाया। डॉक्टर अजय ने कहा कि सड़क दुर्घटन में घायल युवक आदित्य मिश्रा की हालात चिंताजनक बनी हुई है। जबकि युवराज मिश्रा, नीरज और पंकज यादव की हालात में सुधार है।

डॉ. अजय कुमार सिंह, अध्यक्ष जीवन जागृति सोसाइटी

डॉक्टर अजय की माने तो सेंट्रल जेल के पास हुई दुर्घटना में एक युवक की सांस ही गायब थी, जिसे CPR देकर छठी मैया की कृपा से नई जिंदगी दी गई। उन्होंने कहा कि घायलों को अस्पताल पहुंचाने में संस्था के कोषाध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार का काफी सहयोग रहा। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय कुमार सिंह ने बताया कि जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करना मानव जाति का कर्तव्य है और हम घायल व्यक्ति की मदद करके संतुष्ट महसूस कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने संकट में फंसे ऐसे लोगों की सहायता करने की अपील भी की।

डॉक्टर अजय ने कहा कि दुर्घटना के बाद घायल को तत्काल चिकित्सकीय सहायता मिलने पर उसकी जान बचने की संभावना अधिक रहती है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश की जानकारी आम लोगों को न होने से अक्सर लोग घायलों की मदद करने से कतराते हैं। साथ ही बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले व्यक्ति से पुलिस द्वारा कोई पूछताछ नहीं की जाती है। उन्हें दुर्घटना के बारे में गवाह बनाने के लिए बाध्य भी नहीं किया जा सकता।

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