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खाक से फलक तक : 18 साल की उम्र में घर से भागे, मजदूरी की, और अब हैं बिहार के मंत्री..

फिल्मी दुनिया से आने वाले मुकेश सहनी की कहानी भी बिल्कुल फिल्मों की तरह है. वो 18 साल की उम्र में घर (दरभंगा) से मुंबई भागे थे. फिर मायानगरी में जो कुछ भी हुआ वह किसी फिल्म की पटकथा की तरह ही नाटकीय है.

ये कहानी है एक मजदूर के मंत्री बनने की. जिंदगी इत्तेफाक है. कल भी थी, आज भी है. न जाने कितने किस्से मशहूर हैं. कोई घर से भाग गया और कुछ साल बाद कामयाब इंसान बन गया. दुनिया में लाखों लोग मेहनत करते हैं. लेकिन कामयाबी चंद लोगों को ही मिलती है. वक्त के इसी मरहले पर मेहनत को किस्मत की दरकार होती है. कोई गैरराजनीति आदमी दो साल पहले राजनीतिक पार्टी बनाए और इतने कम समय में ही बिहार सरकार का मंत्री बन जाए तो इसे क्या कहेंगे? मेहनत की दरख्त पर किस्मत की बेल शायद ही ऐसी परवान चढ़ती है. फिल्मी दुनिया से आने वाले मुकेश सहनी की कहानी भी बिल्कुल फिल्मों की तरह है. वो 18 साल की उम्र में घर (दरभंगा) से मुंबई भागे थे. फिर मायानगरी में जो कुछ भी हुआ वह किसी फिल्म की पटकथा की तरह ही नाटकीय है.

मुकेश पहुंचे मायानगरी
दरभंगा के गौरा बौराम में रहने वाले मुकेश सहनी तब स्कूल में पढ़ते थे. तकरीबन 18 साल की उमर थी. मुकेश सहनी के एक जिगरी दोस्त को घर से भाग कर कुछ करने की सूझी. उसने मुकेश सहनी को अपने दिल की बात बताई. उन्होंने घर से भगाने के बारे में पहले से कुछ सोचा नहीं था. लेकिन यार के इसरार पर मुकेश भी घर से भागने को राजी हो गए. घर से भाग कर दरभंगा रेलवे स्टेशन पहुंचे. जो पहली ट्रेन आई वह पवन एक्सप्रेस थी, जो मुंबई जा रही थी. घर के लोगों कहीं खबर न लग जाए इसलिए पहली ट्रेन में बैठने का फैसला हुआ. मुकेश सहनी अपने दोस्त के साथ ट्रेन में सवार हुए और जा पहुंचे मुंबई. उनके गांव के कुछ लोग पहले से मुंबई में छोटे-मोटे काम कर रहे थे. कुछ दिन गांव के लोगों के पास रहे. उनकी मदद से पास ही एक दुकान में काम मिल गया. दुकान का नाम था नॉवल्टी स्टोर. पगार तय हुई 900 रुपये महीना. रोटी का इंतजाम हुआ तो मुकेश मेहनत से काम करने लगे. नॉवल्टी स्टोर के बिल्कुल बगल में एक फोटो फ्रेम की दुकान थी.

मुकेश की मायानगरी में इंट्री

मुकेश सहनी के शब्दों में, मैं एक लेबर के रूप में फिल्म देवदास के सेट पर पहुंचा था. काम था सेट को डिजाइन करने के लिए शीशा काटना. मुकेश सहनी में एक जबर्दस्त खूबी है. किसी काम को देख कर तुरंत सीख जाना. मुकेश सहनी ने एक मजदूर के रूप में काम शुरू किया था. लेकिन उन्होंने अपने काम में इतनी नफासत दिखाई कि एक महीने में ही तरक्की हो गई. उन्हें जो भी काम मिलता उसे तय समय से पहले पूरा कर लेते. इसका असर ये हुआ कि नितिन देसाई मुकेश सहनी को नाम से जानने लगे.

शीशा तराशते-तराशते खुद को तराश लिया

फोटो फ्रेम की दुकान के मालिक मस्तमौला थे. जब तबीयत होती काम करते, नहीं तो दुकान बंद कर कहीं चले जाते. उसके बावजूद उनका इलाके में बड़ा नाम था. शीशा काटने और उसे नए-नए शेप देने में उनका कोई जवाब नहीं था. दुकान बंद भी रहती तो लोग इंतजार करते लेकिन फोटो फ्रेम उन्हीं से कराते. मुकेश सहनी की जल्द ही फोटो फ्रेम वाले दुकानदार से दोस्ती हो गई. जब नॉवल्टी में ग्राहक नहीं होते, तो वो फोटो फ्रेम की दुकान पर चले जाते. देखते-देखते मुकेश सहनी भी शीशा काटना सीख गए. कुछ दिनों में वो इतने पारंगत हो गए कि अपने उस्ताद को टक्कर देने लगे. मुकेश सहनी के हुनर को देख कर फोटो फ्रेम करने वाला दुकानदार बहुत प्रभावित हुआ. उसकी दुकान पर फिल्मों के आर्ट डायरेक्टर के एजेंट आया करते थे. फिल्मों पर सेट बनाने के लिए वैसे कारीगर की जरूरत होती थी जो करीने से और तेजी से अगल-अलग शेप में शीशा काट सकें. उस समय फिल्म देवदास की शूटिंग चल रही थी. संजयलीला भंसाली की इस फिल्म के आर्ट डायरेक्टर थे नितिन देसाई. नितिन देसाई मशहूर आर्ट डायरेक्टर थे, जो कई हिट फिल्मों के सेट डिजाइन कर चुके थे. एक दिन नितिन देसाई का एक मुलाजिम फोटो फ्रेम करने वाले दुकानदार के पास पहुंचा. उसने शीशा काटने वाले कुछ कारीगरों के बारे में पूछा. दुकानदार ने मुकेश सहनी को बुलाया. दोनों की बात कराई. मेहनताना तय हुआ पांच सौ रुपये रोजाना. कहां महीने के 900 रुपये और कहां पांच सौ रुपये रोज. मुकेश सहनी ने नॉवल्टी का काम छोड़ दिया. इस तरह वो पहुंच गए फिल्म देवदास के सेट पर. ये सन 2000 की बात है.

काम के बदौलत जमा लिया अपने नाम का सिक्का

मुकेश सहनी ने काम का सिक्का जमा लिया तो उन्हें सेट डिजाइन प्रोजेक्ट का इंचार्ज बना दिया गया. अब मुकेश सहनी के लिए काम नशा बन गया. इसकी गूंज संजय लीला भंसाली तक पहुंची. काम देख कर यह नामचीन फिल्म मेकर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. अब तो हालत ये हो गई कि संजय लीला भंसाली या नितिन देसाई मुकेश सहनी को नाम से बुलाते और कहते कि अमुक काम कल तक कर देना है. अगले दिन काम रेडी होता. दो महीने में ही मुकेश सहनी की कायापलट हो गई. उन्होंने सेट डिजाइन का काम भी सीख लिया. फिर संजयलीला भंसाली ने उन्हें सेट डिजाइन का पूरा कॉन्ट्रैक्ट ही दे दिया. फिल्म देवदास बनते-बनते मुकेश सहनी सेट डिजाइन की सभी बारीकियां दिमाग में उतार चुके थे.

फिल्म सिटी में मिला नाम, दाम और प्यार

अपने काम की बदौलत मुकेश सहनी बड़े-बड़े फिल्म प्रोडक्शन हाउस के लिए अपरिहार्य हो गए. इसकी बदौलत नाम और पैसा खूब कमाया. शाहरुख खान और ऐश्वर्या राय जैसे सितारों के साथ जब अपनी तस्वीर देखते तो फूले नहीं समाते. जब वो नॉवल्टी स्टोर में काम करते थे तब कई बार फिल्म सिटी घूमने की बात सोची थी. वहां से फिल्म सिटी की दूरी करीब दो किलोमीटर ही थी. लेकिन जब वो फिल्म सिटी के गेट पर पहुंचते वहां का गार्ड उन्हें भगा देता था. किस्मत की बात देखिए कि उसी फिल्म सिटी में उन्हें नाम, दाम और बड़े-बड़े फिल्मी सितारों का प्यार मिला. घर से भागने के बाद मुकेश सहनी करीब नौ साल तक मुंबई में जमे रहे. तब तक वो एक कामयाब कारोबारी बन चुके थे.

शुरू हुआ मुंबई से पटना आना-जाना

2010 में उनके मन में विचार आया कि अब कुछ सामाजिक कार्य भी करना चाहिए. उन्होंने अपने स्वजातीय निषाद समुदाय को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया. उन्होंने ‘सहनी समाज कल्याण संस्थान’ की स्थापना की. दो ऑफिस खुले. एक दरभंगा में और एक पटना में. मुकेश सहनी मुंबई से पटना आने जाने लगे. उन्होंने अपने समाज के होनहार छात्रों को पढ़ाने पर ध्यान दिया. फिर उन्होंने ‘निषाद विकास संघ’ बनाया.

बड़े सम्मेलन का आइडिया

2013 में उनके समाज के कुछ लोगों ने सलाह दी कि अगर एक बड़ा सम्मेलन किया जाए तो अच्छा संदेश जाएगा. मुकेश सहनी फिल्मी दुनिया में रहने के कारण पब्लिसिटी और प्रोमोशन का महत्त्व को जानते थे. दरभंगा के राज मैदान में सम्मेलन हुआ. मंच का भव्य सेट बना. खूब प्रचार-प्रसार हुआ. जिलास्तर के सम्मेलन में ही करीब 75 हजार लोग जुट गए. लोगों में इस बात की चर्चा होने लगी कि एक मछुआरा का बेटा है जो मुंबई में बड़ा आदमी बन गया है. यहीं से आस के पंछी ने उड़ान भरी.

सन ऑफ मल्लाह के रूप में सामने आए

इस सभा में मुकेश सहनी ने खुद को पहली बार ‘सन ऑफ मल्लाह’ (सन ऑफ सरदार की तर्ज पर) के रूप में पेश किया. वो निषाद समुदाय के नेता के रूप में उभरने लगे. (मुकेश सहनी का दावा है कि निषाद समुदाय की 22 उपजातियां हैं जिनकी आबादी करीब 15 फीसदी है.) 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के लिए प्रचार किया. फिर वो महागठबंधन में आ गए. 2018 में विकासशील इनसान पार्टी बनाई. 2019 के लोकसभा चुनाव में खगड़िया से महागठबंधन के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा. लेकिन हार गए. उनकी पार्टी के दो अन्य उम्मदवारों की भी हार हुई. हार ने मुकेश सहनी को हाशिये पर डाल दिया.

2020 के चुनाव में पलटी किस्मत

2020 के चुनाव में फिर उनकी किस्मत पलटी. तेजस्वी यादव से खफा मुकेश सहनी ने ऐन चुनाव के समय महागठबंधन को अलविदा कह दिया. आखिरी वक्त में एनडीए में पनाह मिली. वो खुद तो चुनाव हार गए लेकिन उनकी पार्टी के चार विधायकों ने मौके को बहुत खास बना दिया. किस्मत की मेहरबानी देखिए कि चुनाव हारने के बाद भी मुकेश सहनी मंत्री पद पाने में कामयाब रहे.

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